Mon, 21 Jan 2019
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मिथिलामे सहअस्तित्व

पौष २७, २०७३

 – श्यामसुन्दर शशि

गंगा हिमवर्तो मध्ये नदी पञ्च देशान्तरे ।
तैरभूक्तिरिति ख्यातो देशः परम पावन ।।
कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यबै ।
योजगनामि चतुर्विशत् व्यायामः परिकीर्तित ः ।।
मिथिला महात्म्य १४ ।२।५।

गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूर्व कौशिकी धारा ।
पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमाल बल विस्तारा ।
कमला त्रियुगा अमृता धेमुडा वागमती कृतसारा ।
मध्य बहथि लक्ष्मण प्रमृति से मिथिला विद्यागारा ।।
(महाकवि चन्दा झा रचित मिथिला भाषा रामायणमे मिथिलाक सिमा एहि प्रकारे वर्णन कयने छथि )
उपर्युक्त स्लोकसभसँ प्रष्ट होईत अछि जे दक्षिणमे बहैत पवित्र गंगा आ उत्तरमे चमकैत हिमालय पर्वत श्रृंखलाक मध्य पाँच गोट महत्वपूर्ण नदीसँ सिंचित शस्य श्यामल भूमि मिथिला अछि ।

जकरा तिरहुत, तिरहुता, विदेहआदि नामसँ सेहो जानल जाईत अछि । सम्प्रति सेहो मिथिलाक पर्यायवाचीक रुपमे एहि शब्दसभक प्रयोग होईतहि अछि ।

मिथिलाक ई चौहद्दी महाकविलोकनि रचनामे बेर बेर आएल आ साहित्यिक वैसारसभमे वेस चर्चित सेहो भेल मुदा एहि चौहद्दीक वास्तविकता ईतिहास आ भूगोलद्धारा प्रमाणित नही भ सकल अछि । बूझि परैछ मिथिलाक भूगोलक चर्च करैत काल विद्धतगण तथ्याङकसँ बेसी भोवनाक स्वर सुनलनि ।

मिथिलाक सीमाना दक्षिणमे गंगाधरि रहल सत्य अछि मुदा उत्तरमे हिमालयधरि कहियो रहल से नहि बुझना जाईछ । मिथिलाक सिमानाक प्रसंगमे मिथिलाक गौरवशाली लोकनृत्य आ लोकगाथासभमे सेहो चर्च भेल अछि । भाषा, भेषभुषा आ सामाजिक परिवर्तनके संगहि अपनाके परिवर्तन करैत आएल एहिठामक लोक ईतिहासकार लोकनि सेहो मिथिलाक चौहद्दीक वर्णन कयने छथि । यथा :

पूरब जे पुरनिया पुजली पछिम रे बिहार ।
उत्तर जे नेपाल पुजलियै दक्षिण गंगाधार
रोता जे तिलकेसर पुजली झारी बैजनाथ
भोरे उठिक हाथ उठेलिए, दिनकर दीनानाथ ।।
(लोरिक मनियार लोक नाचमे मिथिलाक सीमाक वर्णन )

लोक कवि कहि किवा ईतिहासकारलोकनिद्धारा वर्णित मिथिलाक ई चौहद्दी सटीकमात्र नहि ईतिहास आ भूगोलक तथ्याङकक नजिक सेहो अछि । चाहे रामायणकाल हो वा मध्यकालिन मिथिला कर्णाटवंशीय सिम्रौनगढ कालिन मिथिला हो कि सेन वंशीयकाल । मिथिलाक चौहद्दी उपरवर्णित चौहद्दीसँ मेल खाईत अछि ।

मिथिलाक अस्तित्व वेदकाल्हिसँ मानल जाईत अछि । वेद, पुरान, उपनिपद, मिमांशाआदिमे वर्णित वातावरण, वनस्पति, जीवजन्तुआदिदिस दृष्टिगत करी त बूझि परैछ जे ई आदि ग्रन्थसभ मिथिलेक भूमिपर लिखाएल हो । जनकवंशक उदय संगहि विधिवत रुपे मिथिला राज्यक निव परल छल । ईतिहासकारलोकनि जनकवंशक कार्यकाल ईस्वीपूर्व ३००० सँ ल ६०० ईपूधरि मानैत छथि । एहि बीचमे जनक नन्दनी सीताक जन्म भेल छल ।

शस्य श्यामल भूमिपर बैसल मिथिला पूर्वहिसँ कृषिपर आश्रित रहल अछि । खेती एहिठाँक पारम्परिक पेसा रहल अछि, अर्थात अध्ययन–अध्यापन व्यक्तित्व विकासक माध्यम आ गहन विषयसभपर गंथन–मंथन निरन्तर प्रगतिपथपर आगा बढवाक साधन ।

सभके बूझल अछि जे मिथिलामे जहन बारह बर्षक अनिकाल (रौदी) परलैक त एहिसँ उत्रानवास्ते शिरध्वज जनक हर जोतलनि । मिथिलामे ब्राम्ह्ण आ राजाके हर जोतवासँ वर्जित कएल गेल अछि मुदा कृषिप्रधान मिथिला गणतन्त्रक मुखिया जनक स्वयं हर जोतलनि । जे कृषि पेसाक मर्यादाके वखानमात्र नहि करैत अछि । ई बात अलग जे हरके सीराउरसँ सीताक जन्म सेहो भेल छल। हरक सीतसँ जन्म ग्रहण कएलाक कारणे हुनकर नाम सीता परल कहल जाईत अछि ।

महाकवि चन्दा झा लिखित मैथिली रामायणमे मिथिलाक एहि प्रकारें भेल अछि
की दीव्य भूमि मिथिला हम आवि गेलौं
देखैत मात्र मन लक्ष्मण हम तृप्ति भेलौ
की दीव्य फूल फल वृक्ष अनन्त धान
पक्षी विलक्षण करै अछि रम्य गान ।।
(बालकाण्ड)

ब्रह्मा पुत्र मनुद्धारा विभाजित वर्णव्यस्थाक उत्कर्षकाल छल रामायणकाल । एहि कालमे जातीय विभाजनसँ वेसी समाज वर्णक आधारपर विभाजित छल । यद्यपि वाल्मिकी रामायण, तुलसीकृत रामचरित मानस आ चन्दा झा लिखित मिथिला भाषा रामायणआदिमे वर्णन अछि जे तत्कालीन मिथिलामे सेहो निषाद(नहि खायल जायवला वस्तु खायवला जाति), केवट,मलाह, चमार, माली, धोवी, लोहारआदि जातिक बसोबास छल । वर्णक रुपमे ब्राह्मण, क्षेत्री, वैश्य, सूद्रक उल्लेख त अछिए ।

तुलसीदास लिखैत छथि
ढोल, गवार, शुद्र अरु नारि
ईसव है ताजनके अधिकारी

रामायणकालीन मिथिलाक बात करी त लोक वर्ण आ जातीय पेसाक अनुसार अपन अपन काज करैत छलाह । यथा ब्राह्मण विद्या अध्ययन आ अध्यापन, क्षत्रिय देशक सुरक्षा, वैश्य बनिज आ शुद्र सेवा कर्म करैत छल । एकरा अतिरिक्त निषाद कन्दमूल आ पशु पंक्षीक सिकार क जीवन वसर करैत छल । केवट नाव चलबैत छल त माली, लोहार, सोनार आदि सेहो अपन अपन काज करैत छलाह ।

तात्पर्य जे रामायणकालीन मिथिलामे सेहो जातिय सहस्तित्व कायम छल । सभके सभ अपन अपन पेसामे तल्लीन छलाह आ मिथिलाक विकास निर्माणमे लागल छलाह । तत्कालीन समाजक राजकीय भाषा निःशन्देह संस्कृत छल । दोसर रुपमे कहि त संस्कृत तत्कालीन विश्वक एखनुक अंग्रेजी जकाँ अन्तराष्ट्रिय भाषा सेहो छल । मुदा तत्कालीन अवस्थामे सेहो मिथिलाक मातृभाषा मैथिलीए छल ।

कारण वाल्मिकी रामायणके सुन्दर काण्डमे वर्णित अछि जे जहन हनुमानजी सीताके लंकाक अशोक वाटिकामे भेंटल छलाह त ओ हुनकासंग हुनकर मातृभाषा अर्थात मैथिलीमे गप्प कएने छलाह । भाषविद हनुमानके चिन्ता छलनि जे अन्तरराष्ट्रिय भाषा संस्कृतमे बजलासँ रावणके सुरक्षाकर्मी आ गुप्तचरसभ बूझि जाएत ।

यदि वाचं प्रदास्यामि, द्धिजातिरिव संस्कृताम्
रामणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ।
अवश्यमेव वक्त्वयं मानुसं वाक्यमर्थवत्
मया सान्त्वयितं शक्या नान्यथेयम निन्दिता ।।
वाल्मिकी रामायण सुन्दरकाण्ड श्लोक १८

रामायणकालक बाद बर्षौधरि मिथिलाक अस्तित्व गुमनाम रहल । बारहम् तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वरके उदय होईत अछि आ फेरसँ मिथिला नव सीरासँ अपन आँतर–पातर पसारए लागल ।

ईस्वी १२१६ सँ १२९४ क बीच ज्योतिरीश्वर ठाकुरके कार्यकाल रहल ईतिहासकार लोकनिक मत छनि । हुनकाद्धारा लिखित वर्णरत्नाकरमे मिथिलाक जात–जातिक विस्तृत वर्णन भेटैत अछि । वर्णरत्नाकरमे एतुका जातिक वर्णन ओ एहि प्रकारे कयने छथि :
नागल, तोंगल, तापसि, तेंली,ताति, तिवर, तुरिया, तुलुक, तरुकटारुअ(तरछेवा) घेओल, धाङगल, धाकल, धानुक, धोबार, धुनिया, धलिकार(धनिकार), डोंव, डोवतारुअ, खाँगि,षगार, हाडि, ढाढी, भल, चण्डार(चण्डाल) चमार, गोण्ट, गोन्ति, गोआर, गवार, ओड, शुण्डी(सुंडी), साव, पञ्चकवार,पटनिञा, परिगह, चाविखारि, मुण्डावारी(माडवारी), वीन्द(वीण), कादव, नागर(नगरवासी), सहरिया) प्रभृत मन्दजातिय(मन्दजन) तेवास से कइसनाह जन ।।

ज्योतिरीश्वर ठाकुरके वर्णरत्नाकरमे मिथिलाक जात जातिक जे वर्णन अछि , सम्प्रति सेहो कमोवेश र्र्ईएह जातिक वसोवास एहि भूभागपर अछि । निःसन्देह ई जातिसभ मिथिलाक आदिवासीसभ थिकाह ।
ज्योतिरीश्वरके बाद युगद्रष्टा महाकवि विद्यापतिक प्रादुर्भाव होईत अछि । विद्यापतिक कार्यकाल ई. १३५० सँ १४५० के मध्य मानल जाईत अछि । विद्यापति काल मैथिली भाषा साहित्यक वास्ते मात्र नहि मैथिलके प्रतिष्ठाक वास्ते सेहो स्वर्णकाल छल । भाषा साहित्यक वास्ते मात्र नहि मैथिलके प्रतिष्ठाक वास्ते सेहो स्वर्णकाल छल । कारण एहिकालमे मैथिली भाषामे उत्कृष्ट रचनासभ भेल ।

विद्यापति जे जातिय हिसाबसँ ब्राह्मण छलाह आ राजा एवं दरबारक छत्र–छायामे छलाह । स्वाभावतः तत्कालीन समाजमे सेहो संस्कृत राजकीय भाषाक रुपमे छल । खासक पण्डित पुरोहित आ राजप्रसादमे संस्कृत बुझवामे कठिनाई भ रहल छलनि, लिखवामे त सहजहि ।

मुदा जनकवि विद्यापति अवहट्ठ (अपभ्रंश) कहलनि अछि । जहन ओ अवहट्ठमे कीर्तिलताक रचना कएलनि त तत्कालीन बहिष्कृत होवए पडलनि । अपन एहि दुर्दशाके ओ अपन कीर्तिलतामे एहि प्रकारे वर्णन कयने छथि –
बाल चन्द बिज्जावइ भाषा
दुहु नहि लग्गइ दुज्जन हासा
एक परमेश्वर हर सिर सोहइ
देसिल वयना सबजन मिट्ठा
ते तैसञो जम्पओ अवहट्ठा ।।

एहि पदक आलोकमे कहल जा सकैछ जे चौदहम शताब्दी अवैत मिथिलामे सामाजिक प्रतिष्ठाक विषय जातिमात्र नहि रहि गेल छल । व्यक्तिगत प्रतिभा आ सम्पतिक आधारपर सेहो सामाजिक प्रतिष्ठाक लेखाजोखा कएल जाय लागल छल ।

दोसर शब्दमे कहि त समाजमे सामन्तसभक सूत्रपात होवए लागल छल । दक्षिणदिसि मुसलमान धर्मावलम्बीसभक आ उत्तर दिसि बौद्ध धर्मक प्रभाव बढि रहल छल । दक्षिणमे उद्रु फारसी आ उत्तर दिसि पाली भाषाक प्रभाव सेहो बढल जा रहल छल । एहना अवस्थामे युगद्रष्टा कवि विद्यापति लग अपन आश्रयदाता राजा लोकनिक राजपाट आ जनजनके भाषा दुनूके संरक्षण करबाक गहन चुनौती छलनि ।

संगहि ओ नव सामाजिक चेतनाके सेहो संग ल क आगाँ बढए चाहैत छलाह । इहे कारण छलै जे विद्यापतिक रचनामे थोर बहुत वर्गीय चेतनाक स्वर सेहो मुखर भेल अछि । चुंकी चौदहम् शताब्दीक मध्यधरि संस्कृत  भाषामे भाषागत क्लीष्टा, उच्चारणगत कठिनाई तथा वैयाकरणीय कठोरता आवए लागल छल ते ओ कथित निम्न वर्गक ईक्षा आकांक्षाके सम्मान करैत अपभं्रश कहि वा अवहट्ठा (मैथिलीक प्राचीन रुप) मे रचना कएलनि ।

चुकी मिथिलापर मुसलमान शासकके आक्रमण भ रहल छलैक एहना अवस्थामे विद्यापति आमजनमे राष्ट्रियताक भावना मजबूत कराबए चाहैत छलाह आ एकर प्रमुख माध्यम मैथिलीमात्र छल । तें ओ मैथिलीमे रचना कएल । विद्यापतिक समयसापेक्ष ई निर्णय हुनका जनकवि बनाओल ।

एखनो विद्यापति अपन गंभिर संस्कृत रचनाक वास्ते नहि अपितु मैथिलीमे रचित सवोध गीतसभक वास्ते जनमानसमे चिन्हल जाईत छथि ।

चुकी तत्कालीन समाज संक्रमणकालसँ गुजरि रहल छल तें मिथिलाक भूगोल आ दुनू दिसिसँ भ रहल धार्मिक आ सांस्कृतिक आक्रमणसँ सुरक्षा वास्ते विद्यापति जातीय सहअस्तित्वके पूर्णतः खयाल कएलनि । विद्यापतिक रचनासभमे सेहो मिथिलाक जातिसभक चर्च आएल असिछ ।जे अपन अपन आधारपर जीवन वसर करितहु मातृभूमि मिथिलाक रक्षार्थ तम्तयार रहैत छलाह ।

आधुनिक कालक कवि साहित्यकार आ नाटककारलोकनि सेहो विद्यापति कालीन समाजके अपन अपन रचनाक माध्यमसँ वर्णन कयने छथि । खासक काँचीनाथ झा किरण लिखित विजेता विद्यापति नाटकमे तत्कालीन समाजमे व्याप्त जातिय सहअस्तित्वके नीक जकाँ विकछाओल गेल अछि ।

एहि नाटकके पात्रसभदिसि ध्यानाकर्षण करी त एहिमे तत्कालीन मिथिला नरेश देवसिंह, हुनक पुत्र राजकुमार शिवसिंह, राजकवि विद्यापतिक संगहि सेनापतिक रुपमे जुगेश्वर कामति, विद्यापतिक सहकर्मीक रुपमे रामदेव महतो, जीवछ सिंह आ सर्वसाधारण सोमन आ हुनक धर्मपत्नी रीगाके मुख्य पात्रक रुपमे चित्रण कयने छथि । मुसलमान शासकसंगक युद्धमे एहि पात्रसभक अहम भूमिका देखाओल गेल अछि ।
सम्प्रति मिथिलाक छातिपर दशगज्जा गाडल गेल अछि । प्राचीन मिथिलाक आधासँ बेसी भूभाग भारतमे अछि  आ बांकी भूभाग नेपालमे । सम्प्रति नेपाल राज्य पुर्नसंरचनाक दौरसँ गुजरि रहल अछि । हालहि संविधानसभाक राज्य पुर्नसंरचना समितिद्धारा प्रस्तावित मिथिला, भोजपुरा, कोच मधेस राज्य अन्तर्गत मिथिलाके राखल गेल छैक ।

एहि क्षेत्रक कुल जनसंख्या ६७ लाख ६१ हजार ६७५ अछि जे नेपालक कुल जनसंख्या ( २ करोड ३१ लाख ५१ हजार ४२३ ) के १२.३० प्रतिशत अछि । एहिमे मैथिल भाषिक जनसंख्या २८ लाख ४७ हजार ६२५ अछि । यद्यपि पूर्वक झापा, मोरंग,सुनसरी,उदयपुर आ पश्चिमके रौतहट, बारा, पर्सासहितके जिल्लासभमे सेहो मैथिल भाषिक जनसंख्या उल्लेख्य अछि, मुदा मिथिला राज्य अन्तर्गत सामान्यतयाः सप्तरी, सिरहा, धनुषा,महोत्तरी आ सर्लाही जिल्लाके मानल जाईत अछि ।

२०५८ सालमे राष्ट्रिय जनगणनाके आधारपर देखल जाय त सप्तरीक जनसंख्या ५ लाख ७० हजार २८२, सिरहाक ५ लाख ६९ हजार ८८०, धनुषाक ६ लाख ७१ हजार ३७४ , महोत्तरीक ५ लाख ५३ हजार ४८१ आ सर्लाहीक ६ लाख ३५ हजार ७०१ जनसंख्या उल्लेख कएल गेल अछि ।

जातिय सघनताक विश्लेषण कएल जाय त एहि पाँच जिल्लामे यादवसमुदायके जनसंख्या सर्वाधिक अछि । एहि भूभागमे साढे १७ प्रतिशतसँ बेसी यादव बसोबास करैत छथि त मुसलमानक जनसंख्या साढे १० प्रतिशतके करिब अछि ।

एकरा अतिरिक्त तेली साढे ५ प्रतिशत, कोईरी करिब ५ प्रतिशत, धानुक साढे ३ प्रतिशत, केवट साढे २ प्रतिशत, सूडि अढाई प्रतिशत, एवं ब्राह्मण, राजपूत आ कायस्थ क्रमशः अढाई प्रतिशत, शुन्य दशमलव सात प्रतिशत आ सुन्य दशमलव ६२ प्रतिशत अछि ।

एहि पाँचु जिल्लामे मैथिली सर्वाधिक बाजल जाय वला भाषा अछि । जे प्रमाणित करैत अछि जे एहि क्षेत्रक सभ जाति आ धर्मक व्यक्ति अपन मातृभाषाक रुपमे मैथिलीक प्रयोग करैत छथि ।

कथित निम्न वर्गमात्र नहि मुसलमान धर्मावलम्बीसभ सेहो जनगणनामे मैथिलीके मातृभाषा लिखौने छथि । ई बात अलग जे अपनाके उच्च वर्ण किंवा वर्गक कहौनिहार पिपराक बाबूसाहेब आ महोत्तरीक किछु खानदानी राजपूतलोकनि घोषित रुपमे अपन मातृभाषा हिन्दी लिखौने छलाह आ एहि वास्ते अभियान सेहो चलौने छलाह । जहनकि सभके बुझल अछि एहि क्षेत्रमे चाहे कतवो धनाढ्य किंवा शिक्षित परिवार हो सभक मातृभाषा मैथिलीमात्र अछि ।

तात्पर्य मिथिलामे रामायणकालसँ व्याप्त जातीय, क्षेत्रिय, धार्मिक आ साँस्कृतिक सहअस्तित्व एखनो कायम अछि । जेनाकी मिथिला नाट्यकला परिषद् २०३६से सालसँ एकगोट अभियान चला रहल अछि – मिथिलामे बसोवास कएनिहार सभ मैथिल  ।

ईएह कारण छैक जे हिन्दुक छठिमे मुसलमान भाई अरग चढवैत छथि आ मुसलमानक ताजियामे हिन्दु भाई हाँजी भरैत छथि । हिन्दुक नगर डिहबारक पूजामे मुसलमान चन्दा दैत छथि आ हिन्दु भाई मुसलमानसभक पवित्र ताजिया बनबैत छथि । तात्पर्य जे मिथिलाक भूभागमे जन–जनबीचक सहअस्तित्व एखनो कायम अछि ।।

 

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